USA और Canada के लिए एक अभूतपूर्व शास्त्रीय संकट — छः प्राथमिक प्रमाण
🗺 भौगोलिक स्पष्टीकरण — सम्पूर्ण USA/Canada प्रभावित नहीं
त्रि-पूर्णिमा-संकट विशेष रूप से Seattle, Portland, Vancouver BC और Pacific तट (केवल Pacific Time Zone) पर लागू होता है। इन्हीं पश्चिमी देशान्तरों में भाद्रपद पूर्णिमा पर शुक्र-अस्त तीसरी बाधा बनाता है।
Mountain, Central और Eastern USA/Canada — Chicago, New York, Toronto, Houston, Atlanta आदि — के लिए भाद्रपद पूर्णिमा (२६ सितम्बर २०२६) पूर्णतः शुद्ध है। इन क्षेत्रों के आपस्तम्ब, बौधायन, हिरण्यकेशी अनुयायी सीधे २६ सितम्बर को उपाकर्म करें — कोई विशेष शान्ति नहीं।
अहोबिल-मठ का श्रावण पूर्णिमा + शान्ति का निर्णय (२७ अगस्त) केवल Pacific तट के लिए है।
⚠ महत्वपूर्ण: ग्रहण प्रथम और द्वितीय दोनों उपाकर्मों को रोकता है
| शाखा | Pacific/Mountain* | Central/Eastern |
|---|---|---|
| आपस्तम्ब, बौधायन, हिरण्यकेशी | २७ अगस्त — श्रावण पूर्णिमा ⚠ पहले ग्रहण-शान्ति | २६ सितम्बर — भाद्रपद पूर्णिमा |
| तैत्तिरीय | २६ सितम्बर — भाद्रपद पूर्णिमा | २६ सितम्बर |
| काण्व, माध्यन्दिन | १५ सितम्बर — भाद्रपद पञ्चमी+हस्त | १५ सितम्बर |
| सामवेद | सितम्बर २०२६ — भाद्रपद शुक्ल हस्त (केवल अपराह्ण) | समान |
| द्वितीय उपाकर्म | २७ अगस्त के लिए शान्ति आवश्यक (ग्रहण द्वितीय को भी रोकता है)। आपस्तम्ब द्वितीय के लिए २६ सितम्बर भी वैध। | |
* Pacific zone = केवल Seattle, Portland, Vancouver BC, California तट
वर्ष २०२६ में यजुर्वेदियों के लिए, विशेषकर USA और Canada के पश्चिमी देशान्तरों में, उपाकर्म के सभी सामान्य विकल्प एक साथ विफल हो रहे हैं। धर्मशास्त्र इसे 'सर्वथा-कर्म-लोप-प्राप्ति' कहता है। तीन क्रमागत पूर्णिमाओं में से प्रत्येक पर एक स्वतंत्र दोष आ रहा है। Seattle, Vancouver और Pacific तट पर श्रावण शुक्ल पञ्चमी + हस्त का सामान्य विकल्प भी संक्रान्ति के कारण बाधित है।
यह शोध-पत्र छः प्राथमिक शास्त्रीय प्रमाणों के माध्यम से संकट का समाधान प्रस्तुत करता है, और यह महत्वपूर्ण अंतर स्थापित करता है कि कौन से दोष सभी उपाकर्मों को रोकते हैं और कौन से केवल प्रथम उपाकर्म को।
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यजुर उपाकर्म २०२६
USA और Canada के लिए एक अभूतपूर्व शास्त्रीय संकट
छः प्राथमिक प्रमाणों पर आधारित निर्णय
Āpastamba · Dharmasindhu · Nirṇaya-Sindhu · Tithinirṇayam · Smṛtimuktāphale · Smṛti-Kaustubha
एवं अहोबिल-मठ आह्निक-निर्णय जीवित परम्परा
पण्डित महेश शास्त्रीजी | Mypanchang.com
ग्रहण प्रथम और द्वितीय दोनों उपाकर्मों को रोकता है। बहुत से लोग गलती से मानते हैं कि गुरु-अस्त/शुक्र-अस्त की तरह ग्रहण भी द्वितीय में अनुमत है। यह गलत है। गुरु/शुक्र-अस्त = ग्रह-दोष → द्वितीय में अनुमत। ग्रहण/संक्रान्ति = काल-दोष → द्वितीय में भी वर्जित। सम्पूर्ण प्रमाण अध्याय २-अ में देखें। |
प्रमाण | प्रकार | पृष्ठ |
|---|---|---|
आपस्तम्ब गृह्यसूत्र (प्रश्न ७) + हरदत्त अनाकुलावृत्ति | मूल सूत्र | — |
धर्मसिन्धु | निबन्ध | पृ. ९३, १०८ |
निर्णयसिन्धु | निबन्ध | पृ. १६९-१७७ |
तिथिनिर्णयम् (भट्टोजी दीक्षित) | स्वतन्त्र निर्णय | पृ. ३२-३४ |
स्मृतिमुक्ताफले (वैद्यनाथ दीक्षित) | निबन्ध | पृ. ३२-३४, १५३-१५८ |
स्मृतिकौस्तुभ (अनन्तदेव) | निबन्ध | पृ. १५३-१६१ |
अहोबिल-मठ आह्निक-निर्णय | जीवित मठ-परम्परा | — |
शाखा | पश्चिमी (Pacific/Mountain) | पूर्वी/मध्य |
|---|---|---|
आपस्तम्ब, बौधायन, हिरण्यकेशी | २७ अगस्त (श्रावण पूर्णिमा) + पहले ग्रहण-शान्ति करें | २६ सितम्बर (भाद्रपद पूर्णिमा) |
तैत्तिरीय | २६ सितम्बर (भाद्रपद पूर्णिमा) | २६ सितम्बर (भाद्रपद पूर्णिमा) |
काण्व, माध्यन्दिन | १५ सितम्बर (भाद्रपद पञ्चमी+हस्त) | १५ सितम्बर (भाद्रपद पञ्चमी+हस्त) |
सामवेद | सितम्बर २०२६ (भाद्रपद शुक्ल हस्त) — केवल अपराह्ण | समान |
ध्यान — द्वितीय उपाकर्म: | प्रथम के समान ही — ग्रहण द्वितीय को भी रोकता है भाद्रपद पूर्णिमा (२६ सितम्बर) आपस्तम्ब द्वितीय के लिए खुला | भाद्रपद पूर्णिमा (२६ सितम्बर) द्वितीय के लिए खुला |
⚠ संक्षिप्त उत्तर: नहीं — ग्रहण प्रथम और द्वितीय दोनों उपाकर्मों को रोकता है। यह २०२६ का सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यावहारिक निर्णय है। बहुत से लोग गलती से मानते हैं कि चूँकि गुरु-अस्त और शुक्र-अस्त द्वितीय उपाकर्म में अनुमत हैं, इसलिए ग्रहण भी द्वितीय को नहीं रोकेगा। यह गलत है। ग्रहण बिल्कुल अलग श्रेणी का दोष है। |
उपाकर्म-निर्णय में दो मौलिक रूप से भिन्न प्रकार के दोष हैं:
प्रकार | क्या है | प्रथम | द्वितीय | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|
ग्रह-दोष | ग्रह की स्थिति-आधारित अशुद्धि (ग्रह अस्त/कमज़ोर है) | ❌ वर्जित | ✅ अनुमत | गुरु-अस्त, शुक्र-अस्त |
काल-दोष | काल-आधारित अशुद्धि (समय की अवधि ही अशुद्ध है) | ❌ वर्जित | ❌ वर्जित | ग्रहण, संक्रान्ति, अधिकमास |
पयोगपारिजात का 'ग्रहवेधो न विद्यते' — यह केवल ग्रह-वेध (ग्रह की बाधा) पर लागू होता है। यह काल-दोष जैसे ग्रहण और संक्रान्ति पर लागू नहीं होता।
▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८, मराठी) — सर्वशाखीय, कोई विशेषण नहीं
सर्वशाखीयांच्या गृह्यसूत्रांत उपाकर्माचा जो मुख्य दिवस सांगितला, त्या दिवशीं जर ग्रहण अथवा संक्रांति असेल, तर संक्रांतिरहित असे पंचमी वगैरे काळ घ्यावेत।
→ सभी शाखाओं के लिए — मुख्य दिन पर ग्रहण या संक्रान्ति हो — संक्रान्ति-रहित पञ्चमी आदि लें।
महत्वपूर्ण बिन्दु: 'सर्वशाखीयांच्या' (सभी शाखाओं के लिए) शब्द और प्रथम/द्वितीय का कोई भी भेद न होना — यह सिद्ध करता है कि ग्रहण सभी उपाकर्मों को समान रूप से रोकता है।
▶ गार्ग्य (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३ + निर्णयसिन्धु पृ.१७१)
अर्धरात्राद्घस्ताचेत्संक्रान्त्यां ग्रहणेऽपि वा । न कर्तव्यमुपाकर्मं परत्रेण दोषभाकृत् ।
→ मध्यरात्रि के बाद ग्रहण या संक्रान्ति हो — उपाकर्म न करें (न कर्तव्यम्)। अगले उचित काल में करें।
'न कर्तव्यमुपाकर्मम्' — उपाकर्म नहीं करना चाहिए। प्रथम या द्वितीय का कोई विशेषण नहीं। निषेध पूर्ण और सार्वभौम है।
▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६), मदनरत्न
नित्ये नैमित्तिके जप्ये होमे यज्ञक्रियासु च । उपाकर्मणि चोत्सर्गे ग्रहवेधो न विद्यते ।
→ नित्य, नैमित्तिक, उपाकर्म, उत्सर्जन — इनमें ग्रह-वेध नहीं लगता।
स्मृतिकौस्तुभ इसके तुरन्त बाद (उसी पृ.१५६ पर) ग्रहण का नियम देता है:
▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६) — उसी पृष्ठ पर, तुरन्त बाद
बहूचाः श्रवणे कुर्यूर्ग्रहसंक्रान्तिवर्जिते
→ बहूच श्रवण में करें — ग्रहण और संक्रान्ति से वर्जित [दिन में]।
यह क्रम जानबूझकर शिक्षाप्रद है: ग्रह-वेध अपवाद → तुरन्त ग्रहण-निषेध। स्मृतिकौस्तुभ स्वयं इन दोनों श्रेणियों को एक ही पृष्ठ पर अलग करता है।
स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६) एक परिमार्जन भी देता है:
▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६) — एकमात्र सम्भव लचीलापन
तथातीतार्धरात्रात्परं विद्यमानो दूषको न तत्तूषः
→ जो ग्रहण/संक्रान्ति मध्यरात्रि के बाद समाप्त (अतीत) हो चुकी हो — वह दोषक नहीं।
यही एकमात्र लचीलापन है जो स्मृतिकौस्तुभ देता है — और यह भी प्रथम और द्वितीय दोनों पर समान रूप से लागू होता है। जो ग्रहण मध्यरात्रि की खिड़की में सक्रिय है — दोनों अवरुद्ध हैं।
▶ स्मृतिमहार्णव
संक्रान्तिग्रहणञ्चापि यदि पर्वणि जायते । तन्मासे हस्तयुक्तायां पञ्चम्यां वा तदिष्यते ।
→ पूर्णिमा पर संक्रान्ति या ग्रहण हो — उस मास में हस्त-पञ्चमी लें।
'यदा भवेत्' — जब भी हो। प्रथम-कर्ताओं तक सीमित नहीं। द्वितीय कर्ताओं पर भी समान रूप से लागू।
लोग इन दो वैध कथनों को मिला देते हैं:
• सत्य: 'गुरु-अस्त/शुक्र-अस्त द्वितीय उपाकर्म को नहीं रोकते' — यह सच है, क्योंकि ये ग्रह-दोष हैं
• असत्य: 'इसलिए ग्रहण भी द्वितीय को नहीं रोकेगा' — यह गलत है, क्योंकि ग्रहण काल-दोष है
नित्यकर्म-अपवाद ('ग्रहवेधो न विद्यते') विशेष रूप से ग्रह-वेध के बारे में है — ज्योतिष की वह अवधारणा जिसमें एक ग्रह 'बाधित' या 'पीड़ित' होता है। ग्रहण ग्रह-वेध नहीं है। ग्रहण एक वास्तविक खगोलीय घटना है जो समय की अवधि को ही अशुद्ध बनाती है।
⚠ द्वितीय उपाकर्म कर्ता — श्रावण पूर्णिमा २०२६ (२७ अगस्त): ग्रहण सभी USA/Canada क्षेत्रों के लिए मध्यरात्रि की खिड़की में है। द्वितीय उपाकर्म भी इस तिथि पर वर्जित है — प्रथम की तरह ही। पूर्व ग्रहण-शान्ति के बिना २७ अगस्त को उपाकर्म नहीं कर सकते। ग्रहण-शान्ति पहले करने पर — प्रथम और द्वितीय दोनों कर सकते हैं। |
✓ द्वितीय उपाकर्म कर्ताओं के लिए २०२६ में वैध विकल्प: विकल्प अ: २७ अगस्त (श्रावण पूर्णिमा) — पूर्व ग्रहण-शान्ति के साथ [अहोबिल-मठ मार्ग] विकल्प ब: २६ सितम्बर (भाद्रपद पूर्णिमा) — शुक्र-अस्त द्वितीय को नहीं रोकता [आपस्तम्ब/बौधायन] विकल्प स: पश्चिमी क्षेत्रों में भी भाद्रपद पूर्णिमा द्वितीय के लिए वैध है ध्यान: काण्व/माध्यन्दिन के लिए — १५ सितम्बर (भाद्रपद पञ्चमी+हस्त) |
दोष | प्रकार | प्रथम | द्वितीय | द्वितीय निर्णय का आधार |
|---|---|---|---|---|
ग्रहण | काल-दोष | ❌ वर्जित | ❌ वर्जित (शान्ति के बिना) | धर्मसिन्धु पृ.१०८: सर्वशाखीय — कोई प्रथम/द्वितीय भेद नहीं गार्ग्य: 'न कर्तव्यम्' — पूर्ण निषेध स्मृतिकौस्तुभ: 'ग्रहसंक्रान्तिवर्जिते' |
संक्रान्ति | काल-दोष | ❌ वर्जित | ❌ वर्जित | ग्रहण के समान — सभी समान प्रमाण |
अधिकमास | काल-दोष | ❌ वर्जित | ❌ वर्जित | धर्मसिन्धु पृ.९३; निर्णयसिन्धु पृ.१७२ — दोनों स्पष्ट |
गुरु-अस्त | ग्रह-दोष | ❌ वर्जित | ✅ अनुमत (ग्रह-वेध अपवाद) | पयोगपारिजात: 'ग्रहवेधो न विद्यते' स्मृतिमुक्ताफले: 'गुरुशुक्रयोः कर्तव्यम्' |
शुक्र-अस्त | ग्रह-दोष | ❌ वर्जित | ✅ अनुमत (ग्रह-वेध अपवाद) | तिथिनिर्णयम्: 'शुक्रास्तादावपि कर्तव्यम्' स्मृतिकौस्तुभ: 'वस्तातादावपि कार्यम्' |
काल-त्रय दोष | आपद्धर्म | → श्रावणी+शान्ति | → श्रावणी+शान्ति | व्यास; बृहस्पति — द्वितीय अपवाद नहीं |
एक पंक्ति में सारांश: ग्रह-दोष (ग्रह-दहन) → द्वितीय में अपवाद। काल-दोष (ग्रहण, संक्रान्ति, अधिकमास) → द्वितीय में भी नहीं। छः प्राथमिक प्रमाणों में से किसी में भी कोई अपवाद नहीं।
— पण्डित महेश शास्त्रीजी
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DS=Dharmasindhu | NS=Nirṇaya-Sindhu | TD=Tithinirṇayam | SMF=Smṛtimuktāphale | SK=Smṛti-Kaustubha
उपाकर्म कोई उत्सव नहीं — यह वेदाध्याय-पुनरारम्भ है। स्मृति परिभाषा:
उपाकर्म नाम वेदाध्ययनस्य पुनरारम्भः
upākarma nāma vedādhyayanasya punarārambhaḥ
अर्थ: उपाकर्म वेदाध्ययन का पुनरारम्भ है।
न कदाचिद् उपाकर्म लोपः
na kadācid upākarma lopaḥ
अर्थ: उपाकर्म का लोप कभी नहीं होना चाहिए।
सभी छः प्रमाण उपाकर्म को नित्यकर्म मानते हैं। इसका महत्वपूर्ण परिणाम — पयोगपारिजात का वचन:
▶ निर्णयसिन्धु (पृ.१७२) + स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६), पयोगपारिजात/मदनरत्न से उद्धृत
नित्ये नैमित्तिके जप्ये होमे यज्ञक्रियासु च । उपाकर्मणि चोत्सर्गे ग्रहवेधो न विद्यते ।
→ नित्य, नैमित्तिक, जप, होम, यज्ञ, उपाकर्म और उत्सर्जन में — ग्रहवेध नहीं लगता।
अतः: गुरु-अस्त और शुक्र-अस्त = ग्रह-दोष — और नित्यकर्म ग्रहवेध से मुक्त है — इसीलिए ये केवल प्रथम उपाकर्म पर लागू होते हैं। इसके विपरीत, ग्रहण और संक्रान्ति = काल-दोष — ये नित्यकर्म पर भी लागू होते हैं।
शाखा | मुख्य तिथि | प्रथम विकल्प | द्वितीय विकल्प |
|---|---|---|---|
आपस्तम्ब (कृष्ण यजुर्) | श्रावणी पूर्णिमा | भाद्रपद पूर्णिमा | — |
बौधायन (कृष्ण यजुर्) | श्रावणी पूर्णिमा | आषाढ पूर्णिमा | — |
हिरण्यकेशी (कृष्ण यजुर्) | श्रावणी पूर्णिमा | श्रवण-हस्त | — |
तैत्तिरीय (कृष्ण यजुर्) | श्रावणी पूर्णिमा | भाद्रपद पूर्णिमा (सिंहस्थ वर्ष) | — |
काण्व / माध्यन्दिन (शुक्ल यजुर्) | श्रवण+पूर्णिमा या हस्त+पञ्चमी | भाद्रपद पञ्चमी+हस्त | — |
ऋग्वेद (आश्वलायन/शाकल) | श्रावण श्रवण-नक्षत्र | पञ्चमी | हस्त |
सामवेद | भाद्रपद शुक्ल हस्त | श्रावण हस्त | कन्या-मास हस्त* |
अथर्ववेद (शौनक) | श्रावण या भाद्रपद पूर्णिमा | — | — |
* कन्या-मास विकल्प: स्मृतिमुक्ताफले (पृ.३३) — यदि सिंह-भाद्रपद की मुख्य तिथियाँ बाधित हों → कन्या-मास अपरपक्ष हस्त नक्षत्र।
यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सर्वाधिक गलत समझा जाने वाला विषय है। सभी छः प्रमाण एक समान भेद स्थापित करते हैं।
धर्मसिन्धु (पृ.९३), निर्णयसिन्धु (पृ.१७२-७३), तिथिनिर्णयम्, स्मृतिमुक्ताफले (पृ.३४) और स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५९) — सभी एकमत हैं:
▶ धर्मसिन्धु (पृ.९३)
नवीन यज्ञोपवीतसंस्कारवालोंका प्रथम उपाकर्म बृहस्पति और शुक्रके अस्त आदिमें और अधिकमास आदिमें और सिंहके सूर्यमें नहीं करना।
→ नवीन यज्ञोपवीत-संस्कारवालों का प्रथम उपाकर्म गुरु-अस्त, शुक्र-अस्त, अधिकमास और सिंहस्थ-सूर्य में नहीं करना।
▶ नारायणवृत्ति (निर्णयसिन्धु पृ.१७२-७३ में उद्धृत)
प्रथमोपाकृतने स्यात्कृतं कर्म विनाशकृत्
→ इन निषिद्ध कालों में प्रथम उपाकर्म करने पर — किया गया कर्म नष्ट हो जाता है।
▶ स्मृतिमुक्ताफले (पृ.३४), स्मृतिसार-समुच्चय
यज्ञोपवीतं कर्तव्यं श्रावणे गुरुशुक्रयोः । मौढ्येऽपि वार्धक्ये बाल्ये नित्यकर्मवन्नोदितम् ।
→ श्रावण में गुरु-शुक्र (अस्त/मौढ्य) में भी यज्ञोपवीत (उपाकर्म) कर्तव्य है। मौढ्य, वार्धक्य, बाल्य — नित्यकर्म के रूप में इसका विधान है।
कारण: प्रथम उपाकर्म में संस्कार-अंश होता है (नवीन सूत्रधारी का दीक्षा-संस्कार)। संस्कारकर्म पर कठोरतर शुद्धि-अपेक्षाएँ होती हैं।
सभी छः प्रमाण द्वितीय और परवर्ती उपाकर्मों में ग्रह-दोष की अनुमति देते हैं:
▶ धर्मसिन्धु (पृ.९३)
दूसरा आदि उपाकर्म तौ बृहस्पति और शुक्रके अस्त आदिमें भी करना; परंतु अधिकमासमें नहीं करना।
→ द्वितीय और आगे के उपाकर्म गुरु-अस्त और शुक्र-अस्त में भी करें; परन्तु अधिकमास में नहीं।
▶ तिथिनिर्णयम् (भट्टोजी दीक्षित)
एतच्छुक्रास्तादावपि कर्तव्यम् । प्रथमारम्भस्तु तत्र न भवेत् ।
→ यह (उपाकर्म) शुक्र-अस्त में भी करना [द्वितीय के लिए]। परन्तु प्रथमारम्भ वहाँ नहीं।
▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५९)
द्वितीयाऽपाकर्मे वस्तातादावपि कार्यम्
→ द्वितीय उपाकर्म [गुरु-शुक्र-अस्त] आदि में भी करना।
▶ आत्रेयी दर्शन (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४)
आत्रेये दर्शनात् शुके शक्तियुते गुरुमौढ्येऽपि यजुशासोपाकर्मं कर्तव्यम्
→ आत्रेयी मत से: गुरु-मौढ्य में भी — शुक्र शक्तिमान हो तो — यजुर्वेद उपाकर्म कर्तव्य है।
ग्रहण और संक्रान्ति = काल-दोष। सभी छः प्रमाण बिना किसी भेद के इन्हें सार्वभौम निषेध घोषित करते हैं:
▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८, मराठी) — सर्वशाखीय नियम
सर्वशाखीयांच्या गृह्यसूत्रांत उपाकर्माचा जो मुख्य दिवस सांगितला, त्या दिवशीं जर ग्रहण अथवा संक्रांति असेल, तर संक्रांतिरहित असे पंचमी वगैरे काळ घ्यावेत।
→ सभी शाखाओं के लिए: मुख्य उपाकर्म-दिन पर ग्रहण या संक्रान्ति हो — तो संक्रान्ति-रहित पञ्चमी आदि काल लें।
▶ स्मृतिमहार्णव (निर्णयसिन्धु पृ.१७१ + स्मृतिकौस्तुभ पृ.१५५ में उद्धृत)
संक्रान्तिग्रहणञ्चापि यदि पर्वणि जायते । तन्मासे हस्तयुक्तायां पञ्चम्यां वा तदिष्यते ।
→ पूर्णिमा पर संक्रान्ति या ग्रहण हो — उस मास में हस्त-पञ्चमी लें।
▶ पाण्डुती (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३) — आपस्तम्ब-विशेष
ग्रहणे संक्रमे वाऽपि मौढ्येऽपि गुरुशुक्रयोः । प्रौष्ठपद्यामथाशुच्या उपाकरणमिष्यते ।
→ श्रावण में ग्रहण, संक्रान्ति, या गुरु-शुक्र-मौढ्य हो — भाद्रपद (प्रौष्ठपदी) में उपाकर्म करें।
जब आषाढ, श्रावण और भाद्रपद — तीनों एक साथ दूषित हों — जैसा २०२६ में है — तब:
▶ व्यास (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३)
कालत्रयेऽपि दोषे तु श्रावण्यामेव कारयेत् । पौर्णमास्यास्तु नित्यत्वादापस्तम्बस्य शासनात् ।
→ तीनों कालों में दोष होने पर भी — श्रावणी में ही करें। क्योंकि आपस्तम्ब के शासन से पूर्णिमा नित्य है।
▶ व्यास (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३)
मुक्त्वा भाद्रपदाषाढ्यां श्रावण्यामेव कारयेत्
→ भाद्रपद और आषाढ को छोड़कर — श्रावणी में ही करें।
▶ बृहस्पति (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४) — शान्ति-पूर्वक
श्रावण-प्रौष्ठपदाषाढेषु एकस्मिन्दोषरहिते प्रथमोपाकृतिः कर्तव्या । त्रिष्वपि दुष्टेषु श्रावणमासे शान्तिपूर्विका कर्तव्या ।
→ यदि आषाढ, श्रावण, भाद्रपद में से एक दोषरहित हो — वहाँ उपाकर्म करें। यदि तीनों दूषित हों — श्रावण मास में शान्ति-पूर्वक करें।
अहोबिल-मठ नियम का मूल स्रोत: यह बृहस्पति-वचन है, जो स्मृतिमुक्ताफले में व्यास के काल-त्रय वचन के साथ उद्धृत है। अहोबिल-मठ का आह्निक-निर्णय इन्हीं प्रमाणों पर आधारित है।
दोष | श्रेणी | प्रथम उपाकर्म | द्वितीय आगे | प्रमाण |
|---|---|---|---|---|
ग्रहण (Eclipse) | काल-दोष | ❌ वर्जित | ❌ वर्जित | सर्वशाखीय — सभी छः प्रमाण |
संक्रान्ति | काल-दोष | ❌ वर्जित | ❌ वर्जित | सर्वशाखीय — सभी छः प्रमाण |
अधिकमास | काल-दोष | ❌ वर्जित | ❌ वर्जित | धर्मसिन्धु, स्मृतिकौस्तुभ — स्पष्ट |
गुरु-अस्त | ग्रह-दोष | ❌ वर्जित | ✅ अनुमत | धर्मसिन्धु पृ.९३; स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४ |
शुक्र-अस्त | ग्रह-दोष | ❌ वर्जित | ✅ अनुमत | तिथिनिर्णयम्: 'शुक्रास्तादावपि'; स्मृतिकौस्तुभ |
सिंहस्थ-सूर्य — सामवेद | काल-दोष | ❌ वर्जित | ❌ वर्जित | निर्णयसिन्धु पृ.१७२: केवल सामगानाम् |
सिंहस्थ-सूर्य — अन्य शाखाएँ | लागू नहीं | लागू नहीं | लागू नहीं | निर्णयसिन्धु: 'न तु बहूचादिपरम्' |
काल-त्रय दोष | आपद्धर्म | → श्रावणी+शान्ति | → श्रावणी+शान्ति | व्यास; बृहस्पति; स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३-३४ |
▶ धर्मसिन्धु (पृ.९३)
ग्रहण और संक्रांति का योग उपाकर्मसंबंधी दिनरात्रिमें होवै अर्थात् मध्यरात्रके पहले दो प्रहर और व्यतीत हुये मध्यरात्रके उपरंत दो प्रहर होता है — आठ प्रहरमें विद्यमान और श्रवणनक्षत्रकी पूर्णिमा आदि तिथिसें नहीं स्पर्शत हुआ ऐसाभी ग्रहण और संक्रांतिका योग उपाकर्मकों दूषित करता है।
→ मध्यरात्रि से पहले दो प्रहर और मध्यरात्रि के बाद दो प्रहर = आठ प्रहर की खिड़की। यदि ग्रहण या संक्रान्ति का स्पर्श श्रवण-नक्षत्र या पूर्णिमा-तिथि से न भी हो — तब भी उपाकर्म दूषित होता है।
एक प्रहर ≈ ३ घण्टे। अतः यह खिड़की लगभग सायं ६ बजे से प्रातः ६ बजे तक है — पूरी रात।
▶ पयोगपारिजात (निर्णयसिन्धु पृ.१७१ में)
अर्धरात्राद्यस्ताचेत्संक्रान्तिग्रहणं तदा । उपाकर्मे न कुर्वीत परत्रेण दोषकृत् ।
→ मध्यरात्रि से ग्रहण/संक्रान्ति हो — उपाकर्म न करें।
▶ गार्ग्य (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३ + निर्णयसिन्धु पृ.१७१)
अर्धरात्राद्घस्ताचेत्संक्रान्त्यां ग्रहणेऽपि वा । न कर्तव्यमुपाकर्मं परत्रेण दोषभाकृत् ।
→ मध्यरात्रि के बाद ग्रहण/संक्रान्ति हो — उपाकर्म नहीं; अगले उचित काल में करें।
▶ मदनरत्न/गार्ग्य (निर्णयसिन्धु पृ.१७१)
यच्चार्धरात्राद्वाक्तुर्मृहः संक्रम एव च । नोपकर्मे तदा कुर्यात्श्रावण्यां श्रवणेऽपि वा ।
→ मध्यरात्रि से ग्रहण या संक्रान्ति — श्रावणी या श्रवण-नक्षत्र दिन में भी उपाकर्म नहीं।
▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६)
तथातीतार्धरात्रात्परं विद्यमानो दूषको न तत्तूषः
→ जो ग्रहण/संक्रान्ति मध्यरात्रि के बाद समाप्त (अतीत) हो चुकी हो — वह दोषक नहीं है।
स्मृतिकौस्तुभ का सूक्ष्म भेद: (क) मध्यरात्रि के बाद प्रारम्भ होने वाला ग्रहण → दोष। (ख) मध्यरात्रि से पहले प्रारम्भ होकर मध्यरात्रि के बाद समाप्त होने वाला → अतीत → दोष नहीं।
▶ हेमाद्रि (निर्णयसिन्धु पृ.१७०-७१)
पर्वणि ग्रहणे सति... तेन पर्वणि ग्रहणेऽपि चतुर्थ्यां श्रवणे कार्यमिति हेमादिः
→ हेमाद्रि: पूर्णिमा पर ग्रहण होने पर भी श्रवण-युक्त चतुर्थी पर उपाकर्म कर सकते हैं।
हेमाद्रि का अपवाद केवल तब लागू होता है जब ग्रहण पूर्णिमा-तिथि को स्पर्श करे किन्तु मध्यरात्रि की खिड़की में न हो। २०२६ में Pacific/Mountain क्षेत्रों में ग्रहण मध्यरात्रि की खिड़की में है — अतः हेमाद्रि का अपवाद यहाँ लागू नहीं।
चार स्वतंत्र प्रमाण एक भौगोलिक नियम स्थापित करते हैं:
▶ निर्णयसिन्धु (पृ.१६९-७१), पयोगपारिजात (बृहस्पति-वचन)
नर्मदोत्तरभागे तु कर्तव्यं सिंहयुक्ते । कर्कटे संस्थिते भानौ उपाकल्यां दक्षिणेति वचनात् ।
→ नर्मदा के उत्तर में: सिंहस्थ सूर्य में उपाकर्म करें। दक्षिण में: कर्कटस्थ सूर्य में।
▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८, मराठी), कौस्तुभ से
नर्मदेच्या उत्तरेकडे सिंहस्थ रवि असतां, पंचमी वगैरे काळ घ्यावेत।
→ नर्मदा के उत्तर में सिंहस्थ सूर्य होने पर पञ्चमी आदि काल लें।
▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५८)
नर्मदोत्तर देशे तु कर्तव्यं सिंहयुक्के । कर्कटे संस्थिते भानावुपाकल्यां तु दक्षिणे ।
→ नर्मदा-उत्तर: सिंहस्थ। दक्षिण: कर्कटस्थ।
चार प्रमाणों से पुष्टि: USA और Canada नर्मदा के उत्तर में हैं। भाद्रपद काल में सूर्य सिंह राशि में रहेगा। अतः सभी सिंहस्थ-सूर्य प्रावधान, पञ्चमी-आदि विकल्प और नर्मदा-उत्तर नियम — सब USA/Canada पर सीधे लागू होते हैं।
महत्वपूर्ण: सिंहस्थ-सूर्य का निषेध केवल सामगानाम् के लिए है (निर्णयसिन्धु पृ.१७२)। अन्य सभी शाखाओं के लिए सिंहस्थ सूर्य नर्मदा-उत्तर क्षेत्र में उचित समय है — निषेध नहीं।
▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८)
आपस्तम्बानां श्रावणी पौर्णमासी मुख्या — यत्दभावे भाद्रपदे इति विशेषः
→ आपस्तम्ब: श्रावणी पूर्णिमा मुख्य। यदि न हो — भाद्रपद। यह विशेष नियम है।
▶ पाण्डुती (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३)
प्रौष्ठपद्यामुपाकुर्याच्छ्रावणं दूषितं यदि । आषाढे वाऽपि कर्तव्यं प्रौष्ठपद्यां च दूषिते ।
→ श्रावण दूषित → भाद्रपद। भाद्रपद भी दूषित → आषाढ।
▶ व्यास (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३)
कालत्रयेऽपि दोषे तु श्रावण्यामेव कारयेत् — पौर्णमास्यास्तु नित्यत्वादापस्तम्बस्य शासनात्
→ तीनों में दोष → श्रावणी में ही — आपस्तम्ब के शासन से पूर्णिमा नित्य है।
महत्वपूर्ण: आपस्तम्ब के गृह्यसूत्र में पञ्चमी या हस्त का उल्लेख नहीं है — वे काण्व-माध्यन्दिन के विकल्प हैं। अतः आपस्तम्बी पञ्चमी/हस्त नहीं ले सकते।
▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८)
बौधायनानां श्रावणी पौर्णमासी मुख्या — दोषसम्भावनया तद्भावे आषाढ इति विशेषः
→ बौधायन: श्रावणी पूर्णिमा मुख्य। दोष के कारण न हो → आषाढ।
बौधायन का अनूठा प्रावधान: विकल्प भाद्रपद नहीं — आषाढ है। २०२६ में आषाढ में गुरु-अस्त है → प्रथम के लिए बाधित। परन्तु द्वितीय उपाकर्म के लिए (जहाँ गुरु-अस्त अनुमत है) — आषाढ पूर्णिमा खुला है।
▶ स्मृतिमहार्णव (निर्णयसिन्धु पृ.१७७ + स्मृतिकौस्तुभ पृ.१५५-५६)
संक्रान्तिग्रहणञ्चापि पौर्णमास्यां यदा भवेत् । उपाकरितस्तु पञ्चम्यां कुर्यात् वाजसनेयिभिः ।
→ पूर्णिमा पर संक्रान्ति/ग्रहण → वाजसनेयी पञ्चमी में उपाकर्म करें।
द्वि-शर्त नियम अटल है: केवल श्रवण-नक्षत्र या केवल हस्त पर्याप्त नहीं। वैध युग्म: (१) श्रवण+पूर्णिमा, या (२) हस्त+पञ्चमी।
▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६)
ब्रह्मसंक्रान्तिदूष्टायां श्रावणपौर्णमास्यां तैत्तिरीयैकः प्रौष्ठपादयमुपाकर्मं कार्यम्
→ ग्रहण/संक्रान्ति-दूषित श्रावणी → तैत्तिरीय भाद्रपद में उपाकर्म करें।
▶ गोम्भिल (स्मृतिकौस्तुभ पृ.१५३ + स्मृतिमुक्ताफले पृ.३२)
पर्वण्योदियके कुर्युः श्रावणी तैत्तिरीयकाः । बहूचाः श्रवणक्षे तु हस्तक्षे सामवेदिनः ।
→ तैत्तिरीय → पूर्णिमा। बहूच → श्रवण। सामवेद → हस्त।
सामवेद के तीन अनूठे नियम:
• सिंहस्थ-सूर्य केवल सामगानाम् के लिए श्रावण-गत हस्त/पूर्णिमा रोकता है
• अधिकमास सामवेद के लिए अनुमत (तिथिनिर्णयम्: 'सामगानां त्वधिमासेऽपि भवति') — अन्य के लिए नहीं
• उपाकर्म अपराह्ण में; उत्सर्जन पूर्वाह्ण में
• सिंह-भाद्रपद बाधित हो → कन्या-मास अपरपक्ष हस्त नक्षत्र विकल्प
▶ निर्णयसिन्धु (पृ.१७३), हेमाद्रि/गोम्भिल
अध्यायनासुपाकर्मं कुर्यात्काले पराह्णिके । पूर्वाह्णे तु विसर्गः स्यादिति वेदविदो विदुः ।
→ उपाकर्म: अपराह्ण काल। उत्सर्जन: पूर्वाह्ण काल। — वेदज्ञों का मत।
▶ स्मृतिमुक्ताफले (पृ.३२-३३), छन्दोगाभिहिताः
छन्दोगाभिहिताः कुर्युः प्रातरुत्सर्जनक्रियाया । अपराह्णेऽवुपाकर्मं पुष्यहस्तक्षयोद्विजाः ।
→ छन्दोग (साम): प्रातः = उत्सर्जन; अपराह्ण = उपाकर्म।
सभी छः प्रमाणों से पुष्टि: उपाकर्म = अपराह्ण; उत्सर्जन = पूर्वाह्ण। यह लोकप्रिय धारणा कि उपाकर्म प्रातःकालीन कर्म है — छः प्राथमिक प्रमाणों के अनुसार असत्य है।
▶ निर्णयसिन्धु
सर्वथा कर्मलोपप्राप्तौ शाखान्तरोक्तकालानामाग्रहत्वम् आवश्यकम्
→ जब कर्म का सर्वथा लोप हो — अन्य शाखाओं के काल अनिवार्य रूप से ग्रहण करने योग्य हो जाते हैं।
यह सामान्य शाखा-मिश्रण नहीं — आपद्धर्म है। केवल तभी लागू होता है जब कर्म वास्तव में अन्यथा असम्भव हो।
व्यास और बृहस्पति एक शाखा-अन्तर्गत समाधान देते हैं: श्रावणी पूर्णिमा + ग्रहण-शान्ति। उपाकर्म 'लुप्त' नहीं — शान्ति से संरक्षित है। अतः अहोबिल-मठ परम्परा आपस्तम्बियों को हस्त या पञ्चमी लेने की अनुमति नहीं देती।
▶ बृहस्पति (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४)
शान्तिं कृत्वा तथोऽपि शुक्रदेवेन्द्रमन्त्रगैः । होमैर्नैजैर्गजपैरपि तयोरुदितमन्त्रकैः । कर्तव्यं श्रावणं विप्रेते जीवेन भावितम् ।
→ शुक्र-देवेन्द्र मन्त्रों से, होम और गजप से — शान्ति करके — फिर गुरु (बृहस्पति) से सम्पोषित श्रावण (उपाकर्म) करें।
पूर्णिमा | सामान्य निर्धारण | २०२६ दोष (पश्चिमी USA/Canada) | प्रथम | द्वितीय आगे |
|---|---|---|---|---|
आषाढ पूर्णिमा | बौधायन विकल्प | गुरु-अस्त | ❌ वर्जित | ✅ बौधायन द्वितीय के लिए खुला |
श्रावण पूर्णिमा | सभी यजुर् — मुख्य | चन्द्रग्रहण (मध्यरात्रि में) | ❌ वर्जित | ❌ वर्जित (ग्रहण = काल-दोष, सबके लिए) |
भाद्रपद पूर्णिमा | सार्वभौम विकल्प | शुक्र-अस्त (Pacific/Mountain) | ❌ वर्जित | ✅ पूर्वी क्षेत्रों में वैध; पश्चिम = अहोबिल-मार्ग |
काण्व और माध्यन्दिन के लिए अतिरिक्त जटिलता: श्रावण पूर्णिमा ग्रहण से बाधित → अगला विकल्प श्रावण शुक्ल पञ्चमी+हस्त। परन्तु २०२६ में Pacific/Mountain क्षेत्रों में सिंह-संक्रान्ति उसी पञ्चमी की मध्यरात्रि-खिड़की में पड़ती है। धर्मसिन्धु का सर्वशाखीय नियम अटल है: संक्रान्ति-रहित पञ्चमी → यह पञ्चमी भी बाधित।
श्रावणी [ग्रहण ❌] → भाद्रपद [शुक्र-अस्त, प्रथम ❌] → सभी नियत तिथियाँ बाधित।
→ व्यास + बृहस्पति + अहोबिल-मठ: श्रावण पूर्णिमा + ग्रहण-शान्ति। तिथि: २७ अगस्त २०२६। प्रथम और द्वितीय दोनों।
श्रावणी [ग्रहण ❌] → आषाढ [गुरु-अस्त, प्रथम ❌]।
→ प्रथम: अहोबिल-मठ: श्रावण पूर्णिमा + शान्ति। {text:' द्वितीय:',bold:true} आषाढ पूर्णिमा वैध (गुरु-अस्त द्वितीय में अनुमत)।
→ स्मृतिकौस्तुभ + स्मृतिमुक्ताफले: ग्रहण-दूषित श्रावणी → भाद्रपद पूर्णिमा। २६ सितम्बर २०२६।
श्रावण पूर्णिमा+श्रवण [ग्रहण ❌] → श्रावण पञ्चमी+हस्त [संक्रान्ति ❌] → भाद्रपद पूर्णिमा+श्रवण [शुक्र-अस्त, प्रथम ❌]।
→ भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी + हस्त: १५ सितम्बर २०२६। स्मृतिमहार्णव से।
भाद्रपद शुक्ल हस्त प्राथमिक। सिंहस्थ-सूर्य केवल श्रावण-गत हस्त को रोकता है। भाद्रपद हस्त वैध। → भाद्रपद शुक्ल हस्त, सितम्बर २०२६।
शाखा | २०२६ की सही तिथि | प्राधिकार | विशेष नोट |
|---|---|---|---|
आपस्तम्ब (कृष्ण यजुर्) | २७ अगस्त श्रावण पूर्णिमा + शान्ति | व्यास: कालत्रयेऽपि श्रावण्यामेव बृहस्पति: त्रिष्वपि दुष्टेषु शान्तिपूर्विका अहोबिल-मठ आह्निक-निर्णय | शान्ति पहले। प्रथम और द्वितीय दोनों। |
बौधायन (कृष्ण यजुर्) | २७ अगस्त श्रावण पूर्णिमा + शान्ति | यही अहोबिल-मठ निर्णय धर्मसिन्धु पृ.१०८ | द्वितीय के लिए आषाढ भी वैध। |
हिरण्यकेशी (कृष्ण यजुर्) | २७ अगस्त श्रावण पूर्णिमा + शान्ति | आपस्तम्ब/अहोबिल परम्परा | आपस्तम्ब के समान। |
तैत्तिरीय (कृष्ण यजुर्) | २६ सितम्बर भाद्रपद पूर्णिमा | स्मृतिकौस्तुभ पृ.१५६ स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४ | सिंहस्थ वर्षों में यही नियम। |
काण्व (शुक्ल यजुर्) | १५ सितम्बर भाद्रपद पञ्चमी + हस्त | स्मृतिमहार्णव: संक्रान्ति-ग्रहणे... पञ्चम्यां कुर्यात् वाजसनेयिभिः | श्रावण पूर्णिमा + पञ्चमी दोनों बाधित। |
माध्यन्दिन (शुक्ल यजुर्) | १५ सितम्बर भाद्रपद पञ्चमी + हस्त | काण्व के समान | काण्व के समान। |
सामवेद | सितम्बर २०२६ भाद्रपद शुक्ल हस्त | गोम्भिल: हस्तक्षे सामवेदिनः निर्णयसिन्धु पृ.१७२ | केवल अपराह्ण में। |
शाखा | तिथि | कारण |
|---|---|---|
आपस्तम्ब, बौधायन | २६ सितम्बर — भाद्रपद पूर्णिमा | इन देशान्तरों में शुक्र-अस्त नहीं → सामान्य विकल्प वैध |
हिरण्यकेशी | २६ सितम्बर — भाद्रपद पूर्णिमा | आपस्तम्ब के समान |
काण्व, माध्यन्दिन | १५ सितम्बर — भाद्रपद पञ्चमी + हस्त | श्रावण पञ्चमी संक्रान्ति-दूषित → समान परिणाम |
तैत्तिरीय | २६ सितम्बर — भाद्रपद पूर्णिमा | पश्चिमी क्षेत्रों के समान |
सामवेद | सितम्बर २०२६ — भाद्रपद शुक्ल हस्त | पश्चिमी क्षेत्रों के समान |
स्मृतिमुक्ताफले (पृ.३४) और स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५९) दोनों: उपाकर्म गृहस्थ और ब्रह्मचारी दोनों के लिए साधारण कर्म है।
▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१६१)
...श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थे... छन्दस्सामाध्ययनद्वारा... सहोपाकर्मं करिष्ये इति संकल्पं कुर्यात्
→ श्रीपरमेश्वर की प्रीति के लिए... छन्द-साम-अध्ययन के माध्यम से... उपाकर्म करूँगा — इस प्रकार संकल्प करें।
• नूतन कटिसूत्र धारण
• स्वस्ति-पुण्याहवाचन
• नान्दी-श्राद्ध
• संकल्प (ऊपर के अनुसार)
• गृहाग्नि-उपसिम्हन
• अन्वाधान — 'सावित्रीं ब्राह्मणम्...' मन्त्र से
• प्रधान-देवता: सावित्री, ब्रह्मणस्पति, अनुमति, अग्नि, शकुनी, मित्रावरुणौ, अपः, मरुतः, देवब्रह्माणि, इन्द्रसोमौ, पवमानसोम
बृहस्पति (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४) के अनुसार काल-त्रय स्थिति में शान्ति:
• शुक्र-मन्त्र और देवेन्द्र-मन्त्र जप
• नैज (स्वीय) और गजप मन्त्रों से होम
• गुरु (बृहस्पति) मन्त्र: 'प्रव शुकाय' के साथ समाप्ति
• तत्पश्चात उपाकर्म
आपस्तम्ब गृह्यसूत्र से लेकर स्मृतिकौस्तुभ तक — सभी छः प्रमाण और अहोबिल-मठ परम्परा एक परम सिद्धान्त पर केन्द्रित होते हैं:
न वेदाध्ययनस्य लोपः धर्मे भवति कदाचन
na vedādhyayanasya lopaḥ dharme bhavati kadācana
अर्थ: धर्म में वेदाध्ययन का लोप कभी नहीं होता।
इस षट्-प्रमाण विश्लेषण के मुख्य निष्कर्ष:
• ग्रहण और संक्रान्ति = काल-दोष → सभी उपाकर्म बाधित (नित्यकर्म भी)
• गुरु-अस्त और शुक्र-अस्त = ग्रह-दोष → केवल प्रथम बाधित; द्वितीय में अनुमत (पयोगपारिजात, मदनरत्न)
• काल-त्रय नियम (तीनों मास दूषित) → व्यास + बृहस्पति → श्रावणी + शान्ति — यही अहोबिल-मठ नियम का मूल स्रोत
• प्रत्येक शाखा का अपना विकल्प-क्रम: आपस्तम्ब → भाद्रपद; बौधायन → आषाढ; हिरण्यकेशी → श्रवण-हस्त; काण्व/माध्यन्दिन → पञ्चमी+हस्त — परस्पर विनिमेय नहीं
• सिंहस्थ-सूर्य निषेध = केवल सामगानाम् (निर्णयसिन्धु पृ.१७२); अन्य शाखाओं के लिए सिंहस्थ नर्मदा-उत्तर में उचित काल
• नर्मदा के उत्तर (= USA/Canada) में सिंहस्थ-सूर्य प्रावधान — चार-प्रमाण पुष्टि
• उपाकर्म = अपराह्ण; उत्सर्जन = पूर्वाह्ण — सभी छः प्रमाण सहमत
• स्मृतिकौस्तुभ परिमार्जन: अतीत ग्रहण/संक्रान्ति (मध्यरात्रि के बाद समाप्त) → दोष नहीं
वर्ष २०२६ हिन्दू पञ्चाङ्ग की विफलता नहीं — यह धर्मशास्त्र की उन गहराइयों को प्रकट करता है जिन्हें साधारण वर्षों में जानने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
अपनी शाखा की सही तिथि पर उपाकर्म करें। वेद कभी मौन नहीं होगा।
— पण्डित महेश शास्त्रीजी
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